बागवानी

बागवानी

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फलों का राजा आम हरियाणा का एक महत्वपूर्ण फल है व इसकी खेती अम्बाला, पंचकुला, यमुनानगर कुरूक्षेत्र, करनाल, सोनीपत व जींद जिलों में अच्छी होती है। हरियाणा की जलवायु आम के लिये उपयुक्त है परन्तु ऐसी जगहा जहां तेज ऑंधियां या पाला पड़ता हो वहां आम की खेती करना मुश्किल है। आम के लिये अच्छे निकास वाली उपजाऊ भूमि उपयुक्त रहती है। अधिक नमक व क्षार की मात्रा वाली जमीन इसके लिये अच्छी नहीं होती ।
हरियाणा के लिये उपयुक्त मुख्य किस्में
दशहरी, लंगड़ा, आम्रपाली, बम्बई हरा, चौसा, रामकेला, सिपिया-शाह-पसन्द ।
नोट:
1. फलित वर्ष में किसान खाद की एक अतिरिक्त मात्रा जून में डालें ।
2. गोबर की खाद व फास्फोरस दिसम्बर में व नत्रजन तथा पोटाश फरवरी में दें ।
3. खाद को मुख्य तने से 1-2 मीटर दूर 20-30 सैं.मी. गहराई पर डालें ।
4. पोषक तत्वों का प्रयोग भूमि परीक्षण के आधार पर करें ।
फल गिरना
1. फलों को गिरने से बचाने के लिए यूरिया के दो प्रतिशत के घोल से पेड़ पर अप्रैल-मई के महीने में छिड़काव करें ।
2. लंगड़ा और दशहरी किस्मों में यह समस्या फलों की तुड़ाई से पहले आती है। इसलिए 20 पी.पी.एम. 2,4-डी (2 ग्राम 2,4-डी 100 लीटर पानी में) का छिड़काव अप्रैल के अन्तिम सप्ताह में या मई के प्रथम सप्ताह में करने से फल का गिरना रुक जाता है।
पौधे लगाने का समय
जुलाई-सितम्बर तथा फरवरी-मार्च ।
तोड़ाई उपरान्त रख-रखाव
फलों को पूरी पकी अवस्था में तोड़ना चाहिए अन्यथा उसमें पूरा स्वाद तथा सुगन्ध नहीं आयेगी। पकने का अनुमान फलों को पानी की बाल्टी में भिगोकर किया जा सकता है। जो फल पूरी तरह डूब जाये (आपेक्षिक घन्त्व 1.5) वे ही पूरी तरह पके हुए हैं।
आम को आम तोड़ने वाले यन्त्र या कैंची से तोड़ना चाहिए । तोड़ाई सुबह या देर शाम करनी चाहिए ।
डिब्बाबन्दी और स्थानान्तरण
तोड़े हुए फलों को उनकी किस्म, आकार और पकने की अवस्था के आधार पर अलग-अलग करना चाहिए । गले और पूरी तरह पके हुए फलों को नज़दीक की मण्डी या सरंक्षण के लिए प्रयोग करना चाहिए । अच्छे फलों को लकड़ी की पेटी में अखबार लगाकर दूर की मण्डी में भेजना चाहिए ।
कीट नियन्त्रण
1. आम का तेला या फुदका
यह आम का प्रमुख कीट है। इसके हरे-मटमैले भूरे, फुर्तीले पच्चड़ (बेज) की शक्ल के प्रौढ़ एंव सक्रिय पीले भूरे शिशु बौर, कलियों, फूल की डंडियों एंव नई पत्तिायों से रस चूसते हैं जिससे ये मुरझाकर सूख जाती हैं। अत्याधिक प्रकोप से सारे पेड़ क्षतिग्रस्त हो जाते हैं। इस कीट के शिशु समूहों में फलों व छोटे फलों के डंठलों से रस चूसते है और प्रौढ़ की अपेक्षा अधिक हानिकारक है। बड़ी संख्या में प्रौढ़ पत्तिायों की निचली सतह पर रहकर हानि करते हैं। ये कीट पत्तिायों पर एक मीठा रस भी छोड़ता है जिस पर काली फफूंदी आ जाती है और पत्तिायां चिकनाहट भरी दिखती हैं।
नियन्त्रण एंव सावधानियां
1. बाग ज्यादा घने नहीं लगाने चाहिएं ताकि वृक्षों को ठीक से सूर्य का प्रकाश एंव हवा मिलती रहे। अनावश्यक वृक्षों एवं झाड़ियों को निकाल दें ।
2. बाग में पानी की निकासी ठीक रखें ताकि ज्यादा नमी न रहे।
3. 500 मि.ली. मैलाथियान (सायथियान) 50 ई.सी. 1.5 किलोग्राम कार्बेरिल (सेविन) 50 डब्लयु.पी. को 500 लीटर पानी में मिलाकर फूलों/बंसतकालीन फुटाव के तुरन्त बाद (फरवरी के अन्त तक) छिड़के। यह छिड़काव मार्च के अन्त में फिर दोहरायें ।
2. आम का मिलीबग
दिसम्बर-जनवरी में अधिक संख्या में मिलीबग के छोटे-छोटे अखरोट की तरह भूरे शिशु जमीन के अन्दर अंडों से निकल कर वृक्षों पर चढ़ते हैं तथा पत्तिायों की सतह पर जमा हो जाते हैं। नयु फुटाव आने पर, फरवरी में ये पतली डालियों पर जमा हो जाते हैं। विकसित शिशु और प्रौढ़ मादा, चपटे, मोटे एंव अंडाकार होते हैं तथा इनके शरीर के ऊपर सफेद रंग का मोम जैसा चूर्ण जमा होता है। ये दोनों जनवरी से अप्रैल तक बढ़ती हुई बालियों एंव बौर वाली टहनियों आदि पर गुच्छों की तरह जमा होकर रस चूसते हैं। परिणामस्वरूप डालियां मुरझा जाती हैं तथा प्रकोपित फूल व फल झड़ जाते हैं व अत्यधिक प्रकोप होने पर वृक्षों पर फल नहीं लगते ।
नियन्त्रण एंव सावधानियां
1. दिसम्बर के मध्य के कीट के शिशुओं को वृक्षों पर चढ़ने से रोकने के लिए भूमि से 0.5-1 मीटर की ऊँचाई पर 25-30 सैं.मी. चौड़ी, चिकनी अल्काथीन (250-400 गेज पालिथीन) की पट्टी लगायें । शीट लगाने से पहले वृक्ष की ऊपरी पुरानी छाल 5 से 8 सैं.मी. चौड़ी पट्टी के बराबर कुल्हाड़ी से काटकर छील लें । इस सममतल स्थान के ऊपर 5 सै.मी. चौड़ी तारकोल (लुक) की तरह किसी लकड़ी से लगाकर तुरन्त शीट के निचले भाग को अंगुलियों से अच्छी तरह से दबा दें जिससे शीट और लुक के बीच कोई खाली जगह न रहे । लुक की सहायता से शीट का ऊपरी हिस्सा भी तने पर 2-3 जगह चिपका दें ।
2. बैंड के नीचे एकत्रित कीटों को मारने के लिए1 00 मि.ली. मिथाइल पैराथियान (मैटासिड) 50 ई.सी. या 250 मि.ली. डायजिनान (बासूडीन) 20 ई.सी. या 300 मि.ली. क्विनलफास (एकालक्स) 25 ई.सी. को 50 लीटर पानी में मिलाकर प्रति 50 वृक्षों पर मध्य जनवरी और फिर मध्य फरवरी में छिड़काव करें । पूर्ण विकसित वृक्ष के लिए लगभग एक लीटर घोल की आवश्यकता पड़ती है।
3. आम का तना छेदक
कीट के प्रौढ़ 5-6 सैं.मी. लम्बें एंव मजबूत होते हैं तथा इनकी टांगें एंव एंटीना काफी लम्बें होते हैं तथा छेदक की सूंडियां 6 से 8 सैं.मी. लम्बी, मजबूत व पीले सफेद रंग की होती है। ये सूंडियां तनों व शाखाओं में छाल के नीचे लकड़ी में सुरगं बनाकर उसको अन्दर की अन्दर खाती है, जिससे से पेड़ कमजोर हो जाता है। अधिक प्रकोप में कभी कभी पेड़ सूख जाते हैं।
नियन्त्रण एंव सावधानियां
1. प्रकोपित तनों एवं शाखाओं को काटकर जला दें, ताकि इसके अन्दर छिपी सूडियां एवं प्यूपे मर जाएं ।
2. सुराख पर से बूर (फ्रास) को हटाकर, उससे 10 मि.ली. मिथाइल पैराथ्यिान इमलशन (4 मि.ली. मैटासिड 50 ई.सी. को एक लीटर पानी में) भीतर डालकर मिट्टी से बन्द कर दें।
4. स्केल कीट
किसी-किसी क्षेत्र अथवा बाग में कई तरह के नालीदार (फल्यूटिड) कंटीले एवं नरम स्केल कीट कभी-कभी हानि ज्यादा करते हैं । ये कीट छोटे, गोल एवं पीले भूरे या हल्के भूरे रंग के होते हैं तथा सफेद मोम जैसे चूण्र्ाी पदार्थ से टके रहते है । अण्डों से तुरन्त बाद शिशु, मुलायम टहहिनाें और पत्तियों की निचली सतह पर चिपककर रस चूसते हैं । क्षतिग्रसत वृक्षों का विकास रूक जाता है । ये कीट मीठा रस (मधुस्त्राव) भी छोड़ते हैं जिससे काली चीटियां आकर्षित होती है और फफूंदी भी लग जाती है । फरवरी-मार्च से अक्तूबर नवम्बर तक यह कीट सक्रिय रहता है तथा प्रौढ़ के रूप में शीत-निष्क्रिय होता है।
नियन्त्रण एवं सावधानियां
4. स्केल कीटों से क्षतिग्रस्त वृक्षें पर 1.25 लीटर डाइजिनान (बासुडीन) 20 ई.सी. या 500 मि.ली. मिथाइल पैराथियान (मैटासिड) 50 ई.सी. को 500 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ मार्च और सितम्बर में छिड़के । क्षतिग्रस्त टहनियों को काटकर जला दें ।
रोग नियन्त्रण
रोग व लक्षण
एन्थ्रैक्नोज या टहनीमार रोग:- गहरे भूरे काले रंग के धब्बे पत्तों पर पड़ जाते हैं । टहनियां सूख जाती है । व फलों पर धब्बे पड़ जाते है ।
नियन्त्रण
दिसम्बर से जनवरी:- रोगग्रस्त टहनियाें को काटकर, कटे स्थानों पर बोर्डोपेस्ट लगाएं और फिर 0.3 प्रतिशत (3 ग्राम दवा 1 लीटर पानी) कॉपर आक्सीक्लोराइड के घोल का छिड़काव करें ।
ब्लैक टिप (काला सिरा):- यह रोग भट्टों की जहरीली गैस के कारण होता है । फल सिरे से बे
नियन्त्रण
फरवरी से अप्रैल:- बोरेक्स 0.6 प्रतिशत ( 6 ग्राम एक लीटर पानी) के 2 छिड़काव फूल आने से पहले करें । तीसरा छिड़काव फल बनाने के बाद 0.3 प्रतिशत कॉपर आक्सीक्लोराइड का करें ।
गुच्छा-मुच्छा रोग (मालफोरमेशन):- कोपलों के आगे गुच्छे से बन जाते हैं जोकि फूलों के स्थान पर आते हैं इनमें रही बारीक पत्तियां भी होती हैं ।
नियन्त्रण
रोगी कोपलें काटकर कैप्टान 0.2 प्रतिशत व मैलाथियान 0.1 प्रतिशत के मिश्रण का छिड़काव करें । यह छिड़काव 10-12 दिन के अन्तर पर दोहराएं ।
1) सितम्बर महीने में 300 पी.पी.एम. (300 मि.ग्रा. प्रति लीटर पानी) नेपथलीन ऐसिटिक एसिड का छिड़काव करें ।
2) अगेते फूलों को कैंची से काटें ।
सफेद चूर्णी रोग (पाउडरी मिल्डयू):- पुष्प तथा पुष्प्वृन्तों पर सफेद चूर्ण-सा छा जाता है जिसके कारण फल तथा छोटे पनपते हुए फल गिर जाते हैं । फलों का आकार छोटा रह जाता है।
नियन्त्रण
रोकथाम के लिए फल लगने के तुरन्त बाद 0.1 प्रतिशत (1 ग्राम 1 लीटर पानी) कैराथेन या 0.1 प्रतिशत कलिक्सिन या 0.2 प्रतिशत सल्फैक्स के धोल का छिड़काव करें और आवश्यकतानुसार 15 दिन के अन्तर पर दोहरायें ।

 

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