खेती की बात आते ही हमारे मन में एक गांव की तस्वीर बनने लगती है। बैलगाड़ी, लहलहाती फसल नज़र आने लगती है। एक तथाकथित सभ्य समाज खेतीहर लोगों को थोड़ा फर्क किस्म से देखने लगता है। मसलन एक कम पढ़ा-लिखा, सिर पर एक गमछा बांधा हुए व्यक्ति की अवधारणा बना लेता है। दिक्कत यह है कि उसे बराबरी का दर्जा दिया जा सके, ऐसी छबि बिरले ही आती होगी।
कभी इस बात का आंकलन भी नहीं होता कि जिस सिर पर गमछा या अँगोछा ओड़े व्यक्ति की अवधारणा आपके जेहन में बन रही है, हमारा जीवन उसकी बदौलत ही चल रहा है। हमारे हर खाने-पीने, ओड़ने-बिछाने की सामग्री उसके सौजन्य से ही प्राप्त हो रही है। यानी मसला है कि उसकी गरिमा के बारे में हम लगभग नहीं ही सोचते हैं। एक तबका नए साल का स्वागत करने में खूब खर्चा कर रहा है। बड़ी बड़ी होटलों में पार्टी चल रही हो जिसके एक दिन पार्टी में एक किसान के परिवार के दो-तीन माह या उससे भी ज्यादा का गुज़ारा चल सकता था। वहीं यदि हम देखें तो इस समय वही किसान खेती के संघर्षपूर्ण काम में जुटा है। और यदि वह न जुटा हो तो केवल पैसे से जीवन का संचालन कर पाना सम्भव ही नहीं है।
क्या नए साल के इस जश्न के साथ हम उस मेहनतकश को कम से कम गरिमा के साथ स्वीकार कर सकेंगे। यदि हमारी नज़र में उसका सम्मान जागता है तो इतना भी पर्याप्त है, क्योंकि इस सम्मान के चलते हम उसे अपने जीवन में जगह दे पाएंगे।
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