सुखना झील की अवसादीकरण की समस्या ने अनुसंधान केंद्र को, पिछली दो दषाब्दियों में अपने अनुसंधान प्रक्षेप पर सफलतापूर्वक विकसित तकनीक को लागू करने के लिए प्ररित किया । इस तकनीक में निहित याँत्रिक व जैविक तकनीक को लागू करने के लिए प्ररित किया । इस तकनीक में निहित याँत्रिक व जैविक उपायों ने, अधिकतम रूप् में अपरदित षिवालिक पहाड़ियों से अपवाहित अवसाद की दर को, एक दषक से भी कम समय में विलक्षण रूप में 80 टन से 1 टन प्रति हेक्टेयर से भी कम लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी।
इसी प्रकार, इससे सुखोमाजरी गाँव से संबंधित झील के आस-पास के,
बुरी तरह क्षतिग्रस्त 85 हेक्टेयर के बड़े अपवाह क्षेत्र का पता चला, जो कि
सुखना झील के अवसादी करण के लिए विषेषतया: जिम्मेदार था।
क्षेत्र में द्विचरणीय उपचार के लिए चूना गया पहले चरण में याँत्रिक / संरचनात्मक उपाय सम्मिलित थे। दूसरे चरणीय व्यापक उपायों में, गड्डों में खैर (अकेषिया कटेचु) व ष्षीषम (डलबर्जिया सिष्सू) आदि वृक्षों का रोपण तथा खाइयों के उभारों (टीलों) पर भाभर घास (यूलेलियोप्सिस बिनाटा) तथा क्रांतिक क्षेत्र मे क्षय के विरूध्द मिट्टी की रक्षा करने के लिए अगेव अमेरिकाना व इपोमिया कार्निया का लगाया जाना प्रमुख था। तथापि, विसाद को स्वैस्थानिक रूप से रोकने के लिए किए गए ये उपाय, सुखोमाजरी के लोगों के स्वैच्छिक सहयोग के बगेर सींाव नहीं हो सके, जो कि अपने जीवन निर्वाह के लिए अपवाह क्षेत्र में उपलब्ध संसाधनों पर ही आश्रित थे। जबकि, अनुसंधान केंद्र के लिए सुखना झील की अवसादीकरण समस्या प्रमुख थी, परन्तु सुखोमाजरी के लोगों के लिए इसका कोई विषेष महत्व नहीं था।
इस प्रकार जल्दी ही यह महसूस कर लिया गया कि किसी भी प्रकार के वैज्ञानिक व तकनीकी क्षय अवरोधक उपाय, तब तक सफल नहीं हो सकते जब तक सुखोमाजरी के लोगों के लिए जीवन यापन के वैकल्पिक संसाधनों की व्यवस्था नहीं की जाती। और यह कार्य तभी पूरा हो सकता है यदि ग्रामिणों के आर्थिक हितों की रक्षाा जैसे मुद्दों को भी इस कार्य के लिए बनाई गई नीतियों में सम्मिलित कर लिया जाए। इस अनुभव के परिणाम स्वरूप् ही भूमि बांध का निर्माण कर, सिचांई के लिए जल संसाधन विकसित करने के विचार को कार्यरूप दिया जाने लगा। दूसरे ष्षब्दों में, सुखना झील के अवसादीकरण को दूरदर्षिता व कार्यान्वयन की दृष्टि से, सुखोमाजरी के लोगों की समस्या के निदान की दिषा में एक गौण उत्पादन की तरह देखा गया । यह अपवाह क्षेत्र की रखा के लिए , हमारे द्वारा, लोगों की भागीदारी के माध्यम से किए गए प्रयासों की सफलता की कुंजी सिध्द हुआ, जो कि आज भी प्रासंगिक है।
वर्षाजी संचय
सुखोमाजरी में 1976 से 1985 के दौरान चार भमि बांध निर्मित किए गए (सारणी 1)। ये मुख्य रूप से तीन प्रयोजनों की रक्षा करते है प्रथम, तात्कालिक प्रभाव से कृषि भूखंडों मे नालियों की संरचना न बनने देना व उसके द्वारा मृद्वा क्षय से उत्पन्न अवसादीकरण को प्रभावी रूप् से रोकना, दूसरे अपवाह क्षेत्र से प्रवाहित अतिरिक्त वर्षाजी को संचित करना, जिसका कि मानसू समाप्त होने के बाद सिंचाई के लिए प्रयोग किया जा सके एवं तीसरे अपवाह क्षेत्र को पुनर्स्थापित करना।
क्षेत्र में द्विचरणीय उपचार के लिए चूना गया पहले चरण में याँत्रिक / संरचनात्मक उपाय सम्मिलित थे। दूसरे चरणीय व्यापक उपायों में, गड्डों में खैर (अकेषिया कटेचु) व ष्षीषम (डलबर्जिया सिष्सू) आदि वृक्षों का रोपण तथा खाइयों के उभारों (टीलों) पर भाभर घास (यूलेलियोप्सिस बिनाटा) तथा क्रांतिक क्षेत्र मे क्षय के विरूध्द मिट्टी की रक्षा करने के लिए अगेव अमेरिकाना व इपोमिया कार्निया का लगाया जाना प्रमुख था। तथापि, विसाद को स्वैस्थानिक रूप से रोकने के लिए किए गए ये उपाय, सुखोमाजरी के लोगों के स्वैच्छिक सहयोग के बगेर सींाव नहीं हो सके, जो कि अपने जीवन निर्वाह के लिए अपवाह क्षेत्र में उपलब्ध संसाधनों पर ही आश्रित थे। जबकि, अनुसंधान केंद्र के लिए सुखना झील की अवसादीकरण समस्या प्रमुख थी, परन्तु सुखोमाजरी के लोगों के लिए इसका कोई विषेष महत्व नहीं था।
इस प्रकार जल्दी ही यह महसूस कर लिया गया कि किसी भी प्रकार के वैज्ञानिक व तकनीकी क्षय अवरोधक उपाय, तब तक सफल नहीं हो सकते जब तक सुखोमाजरी के लोगों के लिए जीवन यापन के वैकल्पिक संसाधनों की व्यवस्था नहीं की जाती। और यह कार्य तभी पूरा हो सकता है यदि ग्रामिणों के आर्थिक हितों की रक्षाा जैसे मुद्दों को भी इस कार्य के लिए बनाई गई नीतियों में सम्मिलित कर लिया जाए। इस अनुभव के परिणाम स्वरूप् ही भूमि बांध का निर्माण कर, सिचांई के लिए जल संसाधन विकसित करने के विचार को कार्यरूप दिया जाने लगा। दूसरे ष्षब्दों में, सुखना झील के अवसादीकरण को दूरदर्षिता व कार्यान्वयन की दृष्टि से, सुखोमाजरी के लोगों की समस्या के निदान की दिषा में एक गौण उत्पादन की तरह देखा गया । यह अपवाह क्षेत्र की रखा के लिए , हमारे द्वारा, लोगों की भागीदारी के माध्यम से किए गए प्रयासों की सफलता की कुंजी सिध्द हुआ, जो कि आज भी प्रासंगिक है।
वर्षाजी संचय
सुखोमाजरी में 1976 से 1985 के दौरान चार भमि बांध निर्मित किए गए (सारणी 1)। ये मुख्य रूप से तीन प्रयोजनों की रक्षा करते है प्रथम, तात्कालिक प्रभाव से कृषि भूखंडों मे नालियों की संरचना न बनने देना व उसके द्वारा मृद्वा क्षय से उत्पन्न अवसादीकरण को प्रभावी रूप् से रोकना, दूसरे अपवाह क्षेत्र से प्रवाहित अतिरिक्त वर्षाजी को संचित करना, जिसका कि मानसू समाप्त होने के बाद सिंचाई के लिए प्रयोग किया जा सके एवं तीसरे अपवाह क्षेत्र को पुनर्स्थापित करना।
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