नवजात बछड़ों की देखभाल
किसी भी पशु फार्म तथा पशुपालकों का अस्तित्व अच्छे तथा स्वच्छ कटड़ों तथा बछड़ों तथा बछड़ों पर निर्भर करता है । पशुपालन व्यवसाय से अधिक आमदनी तभी मिल सकती है जबकि जन्मोपरांत मृत्यु दर घटे तथा कटड़ी व बछड़ी स्वस्थ रहें । नवजात कटड़े व बछड़ां की देखभाल में निम्न बातें महत्वपूर्ण हैं:
जन्म के तुरंत बाद
पशु के बच्चे की आंखों, नाक व शरीर के अन्य किसी भी भाग पर लगी हुई झिल्ली की परतों व गंदगी को ध्यानपूर्वक साफ कर देना चाहिए । कटड़े व बछड़े के शरीर को साफ कपड़े से पोंछ देना चाहिए । नाभि (सूंड) के शरीर से तीन सै.मी. की दूरी से काटने के लिए कीटाणु रहित कैंची आदि का प्रयोग करें अन्यथा सूंड में सूजन आ जाती है तथा सूंड की नली से कीटाणु शरीर में प्रवेश कर सकते हैं । सूंड को 3-4 दि तक टिंचर आयोडीन लगाएं तथा नाभि का जख्म बिल्कुल ठीक हो जाए तब तक पूर्ण ध्यान रखें कि जानवर उसको चाटें नहीं ।
खीस पिलाना
जन्म के तुंरत बाद जल्दी से जल्दी (20-30 मिनट से 2-3 घंटे तक) खीस अवश्य पिलानी चाहिए । खीस की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका नवजात कटड़ों व बछड़ों की प्रतिरक्षा शक्ति कायम रखने में है ।
यदि कटड़ा या बछड़ा सीधा ही थन से खीस पी लेता है तो उसके शरीर को अच्छी तरह पोषण मिलता है लेकिन यदि बछड़ा/कटड़ा कमजोर हो अथवा बीमार हो तो उसे वैसे ही खीस पिला देनी चाहिए । प्रत्येक बछड़े /कटड़े का शरीर के भार के अनुसार प्रति 10 किलो भार पर एक किलो खीस देनी चाहिए।
सींग रहित करना
पशुओं में सींग होने से व्यक्ति को चोट मारने का डर रहता है तथा आपस में लड़ने में भी पशुओं को सींगों से चोट लग सकती है ।
कृमि रहित करना
छोटे कटड़ों व बछड़ों में छ: महीने की आयु तक जूणों की बीमारी हो सकती है। इस बीमारी के परजीवी गर्भावस्था में ही माँ से बच्चे के पेट में रक्त संचार द्वारा पहुंच जाते हैं । पैदाइश के कुछ समय पश्चात् मटमैले रंग के बदबूदार दस्त आते हैं व खांसी होती है। यदि ये जूणें अधिक संख्या में हों तो आंत में एक प्रकार का बंध सा पड़ जाता है । पशु जमीन पर गिर जाता है, पैर पटकता है तथा ठीक समय पर देखीााल न की जाए तो मर जाता है । किसान भाई अपने नजदीक के पशु चिकित्सक से मिलकर अपने पशुओं के कृमिरहित करने की दवा अवश्य पिलाएं ताकि कटड़ा व बछड़ा स्वस्थ रहे तथा पशुधन में बढ़ावा मिल सके ।
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